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दुर्ग

13 साल का नन्हा डुग्गू लेगा दीक्षा, जैन धर्म के 45 में से 22 आगम कंठस्थ

दुर्ग | पालन-पोषण की ममता से सजी परवरिश, बचपन की नटखट शरारतें और नादान मस्ती—सब कुछ पीछे छोड़ 13 वर्षीय रूहान “डुग्गू” मेहता ने दीक्षा लेकर जैन साधु बनने का प्रण लिया है। जोधपुर, राजस्थान में 1 जून 2012 को जन्में डुग्गू ने 30 मई को दुर्ग में आयोजित दीक्षा समारोह में वैराग्य का जीवन आरंभ किया।

बचपन से आस्था का सागर
डुग्गू ने कभी नर्सरी, केजी या स्कूल की पढ़ाई तक नहीं की, फिर भी उन्होंने जैन धर्म के 45 आगमों में से 22 आगम कंठस्थ कर रखे हैं। चार कर्म ग्रंथों के 2,000 सूत्र, विभिन्न प्राचीन स्तवन एवं संस्कृत मंत्रों का भी वे स्मरण कर लेते हैं। यह देख कर आयोजन समिति ने इसे “ईश्वरीय करिश्मा” करार दिया है।

दीक्षा समारोह का कार्यक्रम
दीक्षा से पूर्व 29 मई को साढ़े सात बजे वर्षीदान शोभायात्रा के बाद प्रवचन, दोपहर में मेंहदी सांझी एवं शाम चार बजे अंतिम वायणा का आयोजन हुआ। कार्यक्रम का उद्घाटन सत्यनाद संयमोत्सव समिति के संयोजक कांति लाल बोथरा ने किया।

30 मई को सुबह साढ़े सात बजे ऋषभदेव परिसर में लापसी लूट के साथ महाभिनिष्क्रमण यात्रा निकाली गई। आठ बजे से दीक्षा विधि प्रारंभ हुई, जिसमें विनय कुशल मुनि जी ने डुग्गू को जैन सन्यासी होकर जीवन जीने के सूत्रों से अवगत कराया।

पाँच महान व्रतों का पालन
दीक्षा ग्रहण के पश्चात् डुग्गू जीवन भर निम्नलिखित पाँच व्रतों का पालन करेंगे:

अहिंसा: जीवित प्राणियों को हानि न पहुंचाना

सत्य: केवल सत् का साथ और सच्चाई का पालन

अस्तेय: परधन की आग्रहता से परे रहना

ब्रह्मचर्य: इंद्रियों पर नियंत्रण, वेश्याचार से दूर रहना

अपरिग्रह: आवश्यकता अनुसार ही संपत्ति का भोग

सन्यासी जीवन की कठोर अनिवार्यताएँ
दीक्षा के बाद डुग्गू पूर्णतया संन्यासी जीवन अपनाएंगे। वे सूर्यास्त के बाद अन्न और जल ग्रहण नहीं करेंगे और प्रातः सूर्योदय के 48 मिनट बाद ही भोजन या जल लेंगे। स्वयं भोजन नहीं बनाएंगे, बल्कि घर-घर जाकर “गोचरी” अर्थात् भिक्षा ग्रहण करेंगे। किसी भी वाहन का प्रयोग वर्जित रहेगा; वर्षा के चार महीने छोड़कर वे निरंतर पैदल भ्रमण करेंगे।

13 वर्ष की अवसादहीन शरारतों भरी बचपन की जगह अब वैराग्य, ध्यान एवं धर्म की अनन्य साधना लेगी, और डुग्गू का यह निर्णय जैन समाज में अनुशासन व आस्था का जीवंत उदाहरण बन गया है।

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